Sunday, April 2, 2017

कुछ  शेर .. ग़ज़ल के

क्या हुआ किसी को ... कुछ भी तो नहीं
बदला तेरे बगैर कुछ भी तो नहीं
यूँ ही चल रहा जैसा चलता आया है
कौन अपना काहे का गैर कुछ भी तो नहीं
पल भर को होती हैं रंजिश सब से
मिला क्या रख के बैर कुछ भी तो नहीं
होगा इतना ही फासला दरमियान हम दोनों के
हो गयी है मुझे थोड़ी देर कुछ भी तो नहीं
ये ही है वसीयत सिफर की मेरे वारिस
चंन्द ग़ज़लें कुछ कागज़ी कब्रें कुछ शेर........कुछ भी तो नहीं




25 नवम्बर 2016 

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