Wednesday, July 28, 2010

न था गुमां हमे के क्या होगा तेरे शहर में आके......
वहां हर दिन ईद होती थी यहाँ हर रात फाके ......
एक रोज़ पूछा था पता मस्जिद का......
किसी ने कहा के किससे मिलोगे वहां जाके......
कुछ तो उसकी पलके भी नम हुई होंगी....
गया था जो मुझे एक रोज़ देर तक रुलाके.....
किसी को गुमां नहीं हुआ मेरे गम का......
इस कदर मिला मैं सब से मुस्कुरा के........

4 comments:

  1. vaah vaah vaah...........behad umda nazm.

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  2. कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।

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  3. एक रोज़ पूछा था पता मस्जिद का......
    किसी ने कहा के किससे मिलोगे वहां जाके......

    बहुत ,,,सुन्दर ,,,शानदार प्रस्तुति ...वाह ! वाह ! वाह !

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